मेरे अपने
आरामकुर्सी के हथ्थे
उनके स्नेह भरे हाथ ,
सुनहरी झुर्रियों के बीच
चमकती अनुभवी
आँखें
ऊँघा करती,झपकियाँ लेती
कभी चौंक कर आवाज देती
दिवारों से टकरा कर शब्द
पूरे घर की दौड़ लगाती
कण कण जोड़्ती
सबको साथ बांधे
फिर उन तक लौट आती I
कभी कभी प्यार से
खिंजती,झल्लाती मैं
उत्तर देती कभी,
कभी चुप लगा जाती I
थकती आँखे
मंद मंद मुस्काती ,
मेरे खमोशी की भाषा पढ्ती I
फिर भी थकती साँसे,
यूही शोर मचाया करती I
आरामकुर्सी हवा में झुलती ,
चर्र चर्र
चर्र चर्र
फिर भी चहु ओर सन्नाटा व्याप्त है I
घर कि दिवारें रेत सी
सरसराती ढेर मेरे समग्र पड़ी है I
घून खाये सांकल ,
खोखली होती पुस्तैनी घर की नींव ,
मेरा परिचय पूछ्ती
मेरी जिंदगी,
मेरे साथ निशब्द कर खड़ी है I
मेरे हाथों में ग्लास पानी का ,
खाली कुर्सी के पास खड़ी
मैं
निर्वाक टटोल रही
अपने अतीत के पन्नों को ,
जो मेरा अपना था
और
वह जो मुझे पीछे छोड़ गया
उसकी अपनी थी मैं II
समाप्त
किसी का हमसे बिछुड़ना दिल पर घाव छोड़ जाता है और कहते है वक्त उन
घावोँ को धीरे-धीरे भर दिया करता है I लेकिन क्या घर के बुजुर्ग के चले जाने से घर में
हमेशा के लिये एक रिक्त स्थान नहीं बन जाता?घर के बुजुर्ग जो कभी उस घर के कर्ता थे
और घर का परिचय जिनसे था ,
उनका पलायन घर की नींव हिला दिया करता है II
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