24.पापा की बेटी
पापा की बेटी
पापा की बेटी
लघु जीवन की कथा बङी थी
मैं क्या कुछ कर पाया था,
सूर्योदय के प्रथम काल में
नव कोपल उग आया था I
सिक्त स्नेह से गले लगा कर
मैं खुद पर इतराया था,
मंद पवन के हलकोरों में
पुलकित हिय-स्नेह झूलया था I
तेरे जीवन का सब खारा जल
मैं शंभु बन पी जाता था,
हृदय समाहित उर क्रंदन तेरा
सस्वर गीत सुनाता था I
समय भागता प्रतिपल प्रतिक्षण
मैं तुझ संग दौङ लगाता था,
कर संपूर्ण समर्पण जीवन अपना
तेरी परिमित धुरी बतलाता था I
इस विधि की निष्ठुर परंपरा में
जैविक सत्य निभाना था ,
कर दिया सर्वश्व दान हमने
था क्या मेरा,जो मुझे गवाना था I
सिहरा दिगंत जब डोली तेरी
ज्यों त्तोलक कदम बढता था ,
मृदु बादल मेरे नयनों से
खारा जल बरसाता था I
पार खङी तू मुझको तकती
मैं विह्वल इधर बिलखता था ,
धुँधलाती क्षिति रेखा में भी
तेरी ही छवि निरखता था I
एकाकी का कर मैं अनुभव
अविरल आँसू रोता था ,
एक पहेली अनबुझ बतला कर
तुझसे निज नेह छुपाता था I
तेरी स्मृति पाथेय बनी है
मन तृष्णा में मैं जलता था ,
थाह मन सस्मित सम्मुख खङी है
मन व्याकुल, जी घबराता था I
था तटस्थ निर्वाण मुझसे
शेष अगम्य जीवन बिताना था ,
ध्येय नवीन नूतन कुछ अपना
मुझको फिर एक बार बनाना था I
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