मुझे उन चमकती आँखों के सपने पढ़ना अच्छा लगता है ।
सपनों के महल कितने अपने होते हैं ।
घर की दीवार जहाँ सोने की ,छत चाँदी की होती है ।
हर तरफ दीवारों में खिड़कियाँ
और खिड़कियों से छन करआती रुपहली धुप की नरमी
रुपहली धुप मेरी मुठ्ठी में समाती तो नहीं
बस मेरी आँखों से उतर मुझको अपना सा बना देती है ।
ओ मुझपर ,मेरे होने का गुमान आया था अभी,
मुझे पिघला के फिर तुम जैसा बना देती है ।
आओ ,मिलकर हम तुम एक सपना देखे ।
एक सपना ही तो है ,देखने में भला अपना जाता क्या है ।
शायद किसी रोज साथ चलते चलते
ओ तुमसे मुखातिफ़ होकर
तुमसे तुम्हारे घर का पता गर पूछ लिया ,
मैं वही पास खड़ी तेरे सपनों का हक़ीक़त देखूंगी ।।
Sunday, April 2, 2017
35 सपनें
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