Thursday, August 25, 2022

51.सड़क

 #

आजकल खिलखिलाहट नही आती
ओ पिछले पहर में होठों पर थी
माँ के घर अपनी आलमारी में
शायद लॉकर में छोड़ रखा
चाभी भी नही मिल रही
निकाल, किसी के हाथ भिजवा भी देती
शहर आते ,घर से चौराहे के बीच
शायद वहीं कहीं गिर गयी होगी
या किसी कमब्खत ने पॉकेट मार ली हो।
एक पतली सी कोने में अब तक
थोड़ी सी बचा रखी थी
ये भागती दौड़ती सड़कों पर
कल किसी टायर के नीचे दबती चली गयी
बस एक छोटी सी खामोशी बची पड़ी है
आँखों की शिराओं से
मेरे हाथोँ पर टपकती
ना जाने कब मेरे तलवों को छूती
इन सख्त सड़कों पर घुल सी गयी।।

50.सूनापन

 कुछ बातें करते हैं खुशबू की

कुछ मौसम की कुछ पत्तों की
ये डर ये मनहूसियत की बातें
ये ख़ौफ़, ये आसेब-ए-बज़्म
कुछ रज़ा मर्म बचा रखा अब तक
तेरे होने का शायद सुराग मिल जाये

49.वायरस

 ये तो तय हैं कमबख्त ज़ालिम से मिलने बाजार नही जाएंगे

मगर ये ख़ौफ़ दिन रात सताता रहता,
पता नहीं कब वो दबे पांव ,बिना दस्तक़ के मेरे घर बेख़ौफ़ चला आयेगा।(doctor in my house)
अपने हाथों को बड़ी शिद्दत से संभाला मैंने,
अब तो लकीरें भी धुँधली सी नजर आती है(hand wash)
घर के शीशों पर भी एक दीवार बना रखा है
सामने  खिड़की में खड़ा,अपना भी अनजान नजर आता है(social distancing)
बातें करती हूँ सब से ,अब सन्नाटों से डर कैसा
शीशे से फर्श में मैं चार नजर आती हूँ(cleanliness)
ओ जो दीवारों से आतीं हैं मेरे अपनों की बातें
मुझको फुसलाने के किस्से हर रोज़ सुनाया करती
दिन गुजरा हैं
रातें भी गुजर जाऐंगी

फिर अपनों के ठहाकों से

शुरुरें शाम सुधर जाएगी

48.चिठ्ठी

 शायद तुम कुछ आगे निकल गए

या फिर कही पीछे सँकरे गलियारों में खो गए
कुछ तो हुआ ,जो हम थे वो ना रहे
शिकवे शिकायतें तो ठीक
लेकिन जो दरमियाँ था वो क्यो चूक गए
तमान कोशिशें हमने की,
शायद तुमने भी की होगी
क्यो रहा वक़्त हम पर भारी
शायद हम वक्त से ना लड़ सके
इतने तो कमजोर ना हम थे,
तुम्हारे कंधे भी मजबूत हुआ करते थे
समय का तकाज़ा देखो,
सब कुछ तो ज्यों का त्यों रहा
हम ही तुम्हारे कंधों से फिसल गए
बड़ा फक्र हुआ करता था
तुम मेरे साथ साथ पगडंडियों पर चलते थे
मेरे पैर अब तक तुम्हे ढूढते दौड़ते है
तुम्हारे कदम मेरे साथ चलने को थक गए
अब तक हम दोनों के अंदर
पहाड़ों का शेष दबा पड़ा है शायद
कुरेदा, तो मेरी उंगलिओं में
फूलों की खुशबु अब तक बची पड़ी है
घंटियों की आवाज क्या तुम्हें सुनाई देती है?
कल रात सिरहाने में मैंने
चंद पीले लिफ़ाफ़े देखे
कुछ पुरानी चिठ्ठियां थी
लिखावट तुम्हारी थी
मैंने उसे फिर से तुम्हारे सामने वाले दराज में रख दिये हैं
शायद फिर तुम उन पीले पन्नो पर
कुछ जिंदगी लिखोगे
पन्ने बस चंद खाली पड़े है
उनपर फ़लसफ़ा लिख कर पोस्ट जल्दी करना
पता नहीं कल मैं कहीं और आगे ना निकल जाऊ।

45.प्यारी चिड़ियाँ

 छोटी चिड़ियाँ दूर देश से उड़ कर आती है

दाना लाती है,चुन चुन लाती है
बच्चों को खिलाती है ,उन्हें खिलाती है
छोटी चिड़ियाँ खो मत जाना
दूर बहूत है तेरा ठिकाना
उड़ते उङते पँख थके तो
पेड़ छाँव में तुम छुप जाना
आना तुमको वापस ही है
बच्चों को खिलाना है,उन्हें खिलाना है
छोटी....
रात घनी है,बादल छाए
वारिस भी है,ठंड लग रही
बच्चे डर के दुबक दुबक कर
तेरी टोह में जगे हुए हैं
तुम घर आना ,देर ना करना

 

जल्दी आना,
संग में थोड़े तिनके लाना

बच्चों को बहलाना है,
उन्हें सुलाना है
छोटी...
मीठे मीठे लोरी गाना
थपकी दे दे उन्हें सुलाना
नींद अगर ना आये उनको
फिर परियों की कथा सुनना,
फिर भी गर ओ ना माने तो
मीठी चपत लगाना है
उन्हें सुलाना है ....

 

छोटी चिड़ियाँ दूर देश से उड़ कर आती है

दाना लाती है,चुन चुन लाती है
बच्चों को खिलाती है ,

उन्हें खिलाती है,

उन्हें बहलाती है

उन्हें सुलाती है

45.अपने

 45.अपने

कहाँ उँगलियाँ थी ,

मेरे आँसुओं को थामने के लिए

अब मेरे अपने भी,

मेरे मुस्कुराने की वजह पूछते हैं

ये तो नेमत है ख़ुदा की,

हर तूफान से अब तक बचाये रखा

वरना ग़ैरों की तो छोड़िए

अपनों ने भी क्या कोई कसर छोड़ी थी

Monday, September 24, 2018

44.नव जीवन





ये मेरा अंतर्मन
क्यो आज ये मुझसे पूछ रहा है
क्यो बैठे गुमसुम से तुम हो
उठो ,आज फिर चलना है
ये मेरा...
पथ जो पीछे छूट चुका था
स्वर्णिम था ,अब क्या करना है
फूल बिछे थे जिन रस्तों पर
अब कलियों को क्यो चुनना हैं
ये मेरा ...
क्या रिश्तें थे क्या थे नातें
सब कुछ लगते आज पराये
आज चलो फिर नए सिरे से
नव नूतन एक जहां बसाये
ये मेरा...
जग जीवन का सत्य यही है
जब तुम खुश हो, जहाँ खुशी है
बहतें आसूँ का मोल कहाँ अब
अपने मन को तुम खुद समझाओ
ये मेरा...
जीवन की घड़ियाँ अब कम हैं
क्यो रोते हो तुम उठ जाओ
अपनी खुशियो को भर मुठ्ठी में
जीवन पथ पर दौड़ लगाओ
ये मेरा अंतर्मन
क्यो आज ये मुझसे पूछ रहा है
क्यो बैठे गुमसुम से तुम हो
उठो ,आज फिर चलना है
ये मेरा...