
कहने सुनने का वक्त कहाँ था
भाग रही थी सरपट सड़के
आज अभी इस वीराने में
फिर ले आओ चन्द सितारें
स्याह अँधेरी इन रातों को
इक जुगनू रौशन कर जाये I
रख छोड़ी थी चन्द कौड़ियां
सिरहाने से,तुम ले आओ
बाल शुलभ फिर चंचल मन से
मेरे अंतर्मन को तुम, सहलाओ
चन्द मोतियाँ,मेरे होंठो से छन कर
तेरे दामन को तर कर जाए I
टुकड़ों-टुकड़ों में बंटी पड़ी मैं
हर हिस्सों के सौ सौ खिस्सें
जीवन की आपा धापी में
मेरा सब कुछ पीछे छूट चूका है
आज समेटो मुझको इतना
हम
आज यही पर
" मैं"
बन जाऊ I
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