जिंदगी,
नाराज कहाँ थी तुमसे
बस जीने का तर्जुबा कुछ अच्छा ना रहा
जितना ही जज्वां ए जुम्विश थामाँ तुझको
वेमुर्रबत मेरे हाथों से फिसलता ही गया
ओ मेरे सब्र का बाँध था,
दहलीज के किनारों को उजड़ने ना दिया
वरना वक़्त के थपेडों ने
क्या कोई कसर छोड़ी थी
रात की स्याह में
चांदी के उभरने का गुमा,
ओ तस्सली भी
मुझमें आज कहीं चूक गयी
उभर आएं चन्द सुराखे मेरे कोरों से
ये उठा सैलाब ,
मेरे दामन को ज़ार-ज़ार किया
बड़ी ख्वाहिश थी,
मेरी फिक्र को अपने पोरों पर
इख्लाश से समेटेगा कोई,
मैं वहीँ जिंदगी को अपना किराया देकर,
सागर के संग संग हो लुंगी I
जुम्विश (गति)

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