ज्योति किरण
मैं प्रात उषा की कोमल
किरणें
बैठ मिली निद्रित जल कण से,
नाच उठी तरु पल्लव मणिका
नव आलोक के प्रथम मिलन से .
मैं प्रात निशा के संधि काल में
ले चंद दरारें रात प्रलय की ,
साध हिय में दनुज खरोंचे
ज्योतिर्मय पहुँची पास धरा के .
मै अबोध नारी , करुणामयी
पीर समाये तम व्यथित व्योम
की ,
प्रलय- सृजन के संधि काल
में
साक्ष बनी उत्कण्ठ मिलन की .
घन आविष्ट अम्बर से होकर
मै दीप्त –प्रभा पर्वत पर पहुचीं,
बीहड़ गहन अरण्य में घुलकर
पुहुप के कंचन तन पर थिरकी .
पुलक भरा स्पंदन पाकर
किलक उठी मंजरी चहा कर ,
नैनों में कुसमासन भर के
भवरों को न्योता इठलाकर .
प्रात प्रभा का अमिय रस पाकर
निशा यामिनी के अलकें खोलीं,
मृदुल हिलोरें वात- अनिल की
रैन ,दिवा के संग- संग डोली .
अलि अलकों से निरखा भू ने
सरिता ने पलकों पर थामा ,
जा बैठीं सानिध्य पवन के
रवि किसलय सर्वव्याप्त
समाया .
मानस थिर था पलकें मूंदे
शायद सपनों में जी पाए ,
कर्म- क्षेत्र के कठीन सुरों में
रात्रि स्वप्न सुर फिर धुल जाएँ.
कुछ धुँधली यादें बचपन की
जब सपनों में दस्तक देंती ,
प्रात उषा की थाप लिए भी
मन देर दिवा तक अक्सर सोती .
उदय प्रात की ज्योतिर किरणें
काश समाहित हो मानव में
,
रोष दर्प ,मिथ्या जीवन भी
फिर राग सुनाये कंचन सुर में .
समाप्त

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