Thursday, September 29, 2011

4.ज्योति किरणें






ज्योति किरण


मैं प्रात उषा की कोमल किरणें

बैठ  मिली निद्रित जल कण से,

नाच उठी तरु पल्लव मणिका

नव आलोक के प्रथम मिलन से  .

मैं प्रात निशा के संधि काल में

ले चंद दरारें रात प्रलय की ,

साध हिय  में दनुज  खरोंचे

ज्योतिर्मय पहुँची पास धरा के .

मै  अबोध नारी , करुणामयी

पीर समाये तम व्यथित व्योम की ,

प्रलय- सृजन के संधि काल में

साक्ष  बनी उत्कण्ठ मिलन की .  

घन आविष्ट अम्बर से होकर

मै दीप्त –प्रभा पर्वत पर पहुचीं,

बीहड़  गहन अरण्य में घुलकर

पुहुप के कंचन तन पर थिरकी .



पुलक भरा स्पंदन पाकर

किलक उठी मंजरी चहा कर ,

नैनों में कुसमासन भर के

भवरों को न्योता इठलाकर .



प्रात प्रभा का अमिय रस पाकर

निशा यामिनी के अलकें खोलीं,

मृदुल हिलोरें वात- अनिल की

रैन ,दिवा के संग- संग डोली .



अलि अलकों से निरखा भू ने

सरिता ने  पलकों पर थामा ,

जा बैठीं  सानिध्य  पवन के

रवि किसलय सर्वव्याप्त समाया .





मानस थिर था पलकें मूंदे

शायद  सपनों में जी पाए ,

कर्म- क्षेत्र के कठीन सुरों में

रात्रि स्वप्न सुर फिर धुल जाएँ. 


कुछ धुँधली यादें बचपन की

जब सपनों में दस्तक देंती ,

प्रात उषा की थाप लिए भी

मन देर दिवा तक अक्सर सोती .



उदय प्रात की ज्योतिर किरणें

काश समाहित हो मानव में
,
रोष दर्प ,मिथ्या  जीवन भी

फिर राग सुनाये कंचन सुर में  .



समाप्त

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