हम
कुछ कण क्षितिज पर
अव्यवस्थित
क्या तआ॒जुब हो ,गर वो गुम
हुये
वो रात सपनों का आना,भोर में उनका खो जाना
बस कुछ रात्रि स्वप्न सुर ,जो प्रात दिवा में गुम हुये
न कोई दहशत, न खुद के खोने
का डर
आते जाते सड़कों की भीड़ में ,हम
गुमनाम गुम हुये
कुछ बुझें संवाद, कुछ अनकहे संबोधन
कोई ग्रन्थ कोई संग्रह नहीं ,क्या हुआ गर गुम हुये
कभी चित्कार कभी कहकहे ,क्रंदन,
डरना
सब यहीं कहीं हवा में घुल
कर सांसों में गुम हुये
कभी फूलों पर अटखेलियाँ,खुद पे इतराना
ओस के चंद कतरें मिल बूंद बने, फिर गुम हुये
लम्हा लम्हा अपने सहारे के
कर्जदार बनें
किस्त दर किस्त कर अदायगी
फिर गुम हुये
खुद जलकर रोशनी को जलाने का अहसास
बूझकर आँधी में जलने की शिद्दत में गुम हुये
आओं कोई मुठ्ठियों में
भीजों मुझें
कण कण समेट बूँद सदृश बंनाओ
मुझें
मै हूँ, मेरे होने का अहसास
कराओं मुझें
ढीली पड़ी जो मुठ्ठियाँ फिर
ना कहना जो हम गुम हुए .

No comments:
Post a Comment