मानव और प्रदुषण
चलीं
मैं सफर पर नहीं साथ कोई
है
पथरीली राहें मंजिल पहाड़ों की चोटी
उबड़ खाबड़ रास्तों पर गुम सुम चलती रहीं मैं
मगर जब मैं पहुँची कोई चोटी नहीं थी
था समतल सा कुछ पर मंजिल नहीं थीं
ना थी घड़ियों की टिकटिक न था जीवन का करतव
ना ही पतझड़ का मौसम न ही सावन का आलम
ना थी बूंदों
की रिमझिम ना ही ठंडी हवाओं की ठंडक
ना ही लू की
तपती हवाओं में जलता हुआ तन
सभी मौन थें
!
हवा मौन थीं
!
नभ मौन था
!
धरा मौन थी
!
ये चुप्पी भी मानव तेरी देन है
तेरा ही खेला सभी खेल है
तुने ईश्वर की देन को किया अस्त वस्त
सारी संस्कृति सारी सभ्यता को किया ध्वस्त
विज्ञानं कह कर सभी कुछ को बदला
मानव प्रकृति मगर क्या तू बदला
ऐ
मानव संभल कही हो न विलम्ब
प्रदुषण
को रोक प्रकृति बचा .......................

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