Thursday, September 29, 2011

7.समय के उस पार






समय के उस पार



चल चलो खुद को लिए उस पार  दिन के ,

कालपथ के स्वेत कण नेह आंचल में समेटे  I




छोड़ पीछे सिन्धुजल में प्रेम वसुधा स्नेह मोती , 

छोड़ नन्ही उंगलियाँ,खुद में समेटा अंक ज्योति I

वो याद मीठी ,रसभरी ,स्नेह की कोमल शिराएँ 

वो स्नेह छाती में धधकती व्यर्थ चिंता तर्क आहें I




कुछ लकीरें उम्र की,गुजरे समय का रससत्व लेकर,

पृष्टभूमि में बचा कुछ स्वर्णयुग का अंश लेकर I

कुछ वक्त तो मुझको लगा ,ताल की घड़ियाँ बदलने ,

फिर रास आया ,जीवत्व की विस्मयभरी कड़ीयाँ सँवरने I




कुछ था जो अंकित विगत,आंचल में समेटे ,

कुछ छोड़ कड़वी,बात मीठी चल दी  लपेटे I

जो स्नेहवसुधा में निहित, वो सब था समर्पित ,

अश्रुकण से धो के मानस, तुम को मैं थी अर्पित I




राह सबकी है अलग,सब पुष्प विकसित हो रहे हैं,

अब सितारे मुक्त अम्बर में नजर से खो रहे हैं I

शायद अकेले भय लगे,पर हो कंही हम साथ होंगे ,

पहचान होंगी उनकी अपनी,आप खुद पहचान होंगे I 





हैं ठहाकें घुल रहे,होठों का कंपन रास आया,

जी उठी मै फिरसे युगमें सम्मुख समयका भास आया I

परछाईयों पीछे रही मै अग्र-पथ पर चल पड़ी  हूँ ,

अभिनीत लौ की रौशनी में मोम सी पिघल रही हूँ I




ले उषा की चंद किरणें तिमिरधन के घण क्षितिज पर,

चल समेटे विगत आयु ,स्वप्न के अभिनव सतह पर I 

मै रहूँगी ,मन प्रिय, हर पल तुम्हारा साथ होगा ,

स्नेह धागों में पिरोया मोतियो का अनोखा हार होगा I



समाप्त




3 comments:

seema said...

जीवन पल पल अपने रंग बदलता है ..शायद इसीलिए इसे जीवन,जो जीवित हो कहते है...समय के साथ आपके रिश्तों में बदलाव आते है ..जो आपको सुख दुःख की परिभाषा से परिचित करवाते है...और शायद इसीलिए आपके जीवन की रागात्मकता बनी रहती है.. एक लय बना रहता है.. ....
बस हर रिश्तें की मिठास अपने अंदर समेटे जीवन पथ पर आगे बढते चले जाना है .....

mithilanchalgroup said...

beautiful post:)

seema said...

thanks Awadhesh,I don't have litature background .I have done PhD in botany but trying hand in hindi as i love it.इसलिए मेरी त्रुटियों कों अन्यथा नहीं लेंगे