बेटी
तुम्हारी सिसकियाँ गर
हवा के संग मेरे कानों कों छू जाती
मैं घबड़ाकर नींद से जगती ,
तुम्हें अपने आगोश में समा लेती
तुम खिलखिलाती हुई
नन्हें कदमों से दौड़ती,ठोकर
खा गिरती
तो तेरी सिसकियाँ रुलाती
मुझें
मै तुम्हें चाँद की रजत
बाँहों में झुलाती
मीठी थपकियाँ दे बहलाती
परीदेश की परियों का आवाहन
करती
जो हवा के पंखो पर तेरा
दर्द ले उड़ जाती
तुम हँसती , खिलखिलाती
फिर धीरे धीरे मीठी झपकियाँ
ले
मेरी बाँहों के झूले में
चुप सो जाती
तुम्हारे गालों पर टपकें
स्वर्ण मोतिओं कों
सहेज करकर मैं अपने आंचल
में
बड़े प्यार और जतन समेटती
जब तू नींद से जग कोमल
उँगलिओं से छुती
मैं अपने मात्रित्व पर
डोलती इठलाती ......
तुम अब किशोरी हो अल्लहड़,उन्मुक्त
मैं अब भी तुम्हारी जननी ,शायद
तुम्हारे भावनाओं के अंतर्द्वंद से परे
तुम पर अपना स्नेह उधेलती
तुम्हें छुने कों अपना हाथ बढ़ाती
तुम फिसलकर लहरों के सैलाव में खो जाती
मै भावनाओं में बद्ध ,मूक
मूर्ति जड़ बन आस लिए बैठी रहती
उन कोमल नन्हीं उंगलिओं कों छूने
जो बिखड़ी पड़ी शतदल पर ओस की बूंदों जैसी
अपने वयसके भूलभुलैयों में
अकेली डूबती उतरती ,किनारों कों ढूढ़ती
हाथ भी न बढ़ाती ,जिसें मैं थाम सकूँ
2 comments:
बेटी,माँ की अपनी खुद की प्रतिध्वनि होती है /माँ बेटी का रिश्ता असीम ,अमाप,अथाह प्रेम के कोमल मजबूत धागों से जुडा होता है /जहाँ बचपन में माँ अपने बेटी की परिचालिका होती है वही बुढ़ापे में बेटी माँ की /दोनों के रिश्तों के हर उम्र में अलग अलग आयाम होतें है उन्ही में से एक उम्र जहाँ बेटी किशोरावस्था में प्रवेश करती है .सबसे अहम और निर्णायक दौर होता है /यह अनबूझ कड़ी बेटी के बचपन और यौवन दोनों कों जोर्ती है ,समय के इस दौर में माँ के संयम की परीक्षा होती है और उसमे सफलता ही नन्ही बालिका कों एक सुसंस्कृत युवती में परिवर्तित करने में सहायक
The feelings and emotions expressed in the poem are universal in nature and therefore relevant at all times.
Flow and composition touches the heart of the reader.
Minor spell correction and re-orientation of words will add value to your creation.
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