Saturday, October 1, 2011

9.मैं और मेरी मंजिल




मैं और मेरी मंजिल


मैं पथभ्रमित हूँ,

दिशाहीन सँकरे पथ पर I

उदेश्य विहीन

सुदूर मंजिल पर

शायद कोई प्रतीक्षा कर रहा हो....



धौकनी की तरह सांसे

धिसटती मैं मेरा संपूर्ण अस्तिवत

अंधकार ,मृगमरीचिका सदृश्य

वैभव कुंठित ,मैं गौण

पर आशा कोई प्रतीक्षा कर रहा हो........



घट घट कर रास्ते,लंबे सर्प की तरह

अंतहीन पथ ,समुख्ख दर्शित

छुने पर हाथों से छिटकता,फिसलता

पर है आशा ,शायद स्पर्श उसका

जो प्रतीक्षा में खड़ा मंजिल पर ..........



शायद इस मृगमरीचिका में फंस कर

मैं, मेरा अंतर्मन ,मेरा अस्तित्व

बिना किसी परिचय ,आदर के

विलीन हो जाये पथ पर खोकर

खत्म हो जाये मिलने की आकांक्षा 

शायद मंजिल पर जो प्रतिक्षा कर रहा हैं.......................



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