Saturday, October 1, 2011

10.महानंदा,जीवन या अभिशाप

महानंदा,जीवन या अभिशाप




कुछ शबनम की बूंद पड़ी धरती पर 

उठी धरा शर्माती ,कसमसाती

अलसाई सी आँखों पर टपकी कुछ बूंदें

लगी थिरकने ,बाग बाग होकर मस्ती में....




लगी घुमरने जब, काली घनघोर घटाएँ

 हुआ उन्मुक्त नभ ,जब चली  ठंढी हवाएँ

नवकोपल नवपल्लव पर उन्माद सा छाया

बाग-बाग हो उठा गगन,जीवान्त हर साया




थमीं नहीं जब नभ की उन्मुक्त जीवन की बूंदें

आँख बचा कर धरा कहीं तब लगी सिसकने

महानंदा की चित्कारों में खों गई अंबुज की बूंदें

खौफं में मचलीं दिशाविहीन महानंदा की लहरें




कुछ ऊँची कुछ नीची, होकर घर- आँगन में उतरी

चौखट भींगी सांकल भींजे,जन-जीवन का अंग भिगोयाँ

पर सुखा था माँ का आँचल,भूखी माँ की जिह्वा सुखी

व्यथित व्योम था,हवा मंद थी ,भरी पीड़ से धरा कराही 



अचला की आँखों पर मेघपुष्प का पट्टी सा था

ना गाँवों में गलियाँ थीं ,ना बीच चौराहा बचा था

कुछ सर छत पर ,कुछ घुटनों के बीच धँसे थें

कुछ किस्मत,तो कुछ अनचाही अनहोनी सा था




दूर कहीं ऊँचे छज्जे पर बैठा निष्ठुर  मानव

कुछ ख़बरें  मरने की, अखबारों में पढ़ कर

कुछ सुनते, कुछ-कुछ आपस में बातें करते

कुछ करने की मृषा जोश पे बस पलभर उठते.




ऐ घन की व्यथा तीय , कुछ देर थमों तुम

हुआ त्राहि चहुओर ,कुछ संयम,धीर धरो तुम

कैसे अबला धरणी, चुपचाप सहें तेरे हादसे

भरा हिय सन्ताप  ,चित्त शांत करो तुम II








1 comment:

seema said...

ye kavita maine undino likhi thi jub main dhalkola,near purnia me thi..