घर
जब मैं चौराहे पें पहुँची,
घर का पता मुझको नहीं था............
बन के कोपल मैं खिली
थी
मातृत्व के कोमलशिखर
पर .
बाप की उँगलियाँ धरे मैं
चलदी फिर नूतन सफर
पर .
धक्का –मुक्की ,
रेलम- पेला
हो के हर पहलू से चल
दी .
भाव मीठे,कोमल हृदय
मन
कर के सब उत्सर्ग चल
दी .
कुछ पाके मोती
सिन्धुजल में
मन हुआ आस्वस्त जबकुछ .
ना थाह थी न निशा
बचें थे
चढ चुका था अर्घ्य
सब कुछ .
मेरा हृदय अब था अकेला
मन तृषा फिर भी बचीं थी .
साथ हो लूं उत्कंठ इक्छा
आ के चौराहे खड़ी थी .
जब मैं चौराहे पें पहुँची,
घर का पता मुझको नहीं
था............
प्रथम संध्या के
अरुणदृग पर
फिर मिला सुकुमार
सहचर .
बंधके नूतन आवरण
में
मैं चली मृदु नवपल्लव
सजानें .
मैं समय पर थी निछावर
प्राण प्राणों से मिले
थें .
काल के अभिनव
क्षितिज पर
प्रात मुखरित हो
रहे थे .
पर दबी मैं
कर्ज से थी
देहधर्म था मुझको
निभाना .
जा निहारा आसमां को
था रतन अनमोल पाना .
बढ़ के आंचल में
संजोया
मूक भावना से बंधी
थी .
थामें नवजीवन की पोरें
बीच चौराहें
खड़ी थी .
जब मैं चौराहे पें पहुँची,
घर का पता मुझको नहीं
था............
बेरोक जीवन के सफर
की
स्वयं पथ-निर्देशिका थी .
स्नेह कण सब बिखरे
पड़े थे
उनकी मैं परिचालिका थी .
सिन्धु, जल धारा बनी मैं
उत्पल कुसुम मुझमे
समाया .
कर मुक्त जीवन के
हुईं मैं
सागर समग्र जब व्योम
आया .
ढोकर धरोहर संस्कृति की
ढोकर धरोहर संस्कृति की
कंधे हमारे थक चुके थे .
स्वर्णिम किरण अब भास्कर के
तम के अंदर धँस परे थे .
कुछ देर बैठी,खुद
को पाया
सम्मुख चौराहा पड़ा था .
रास्तों को जानती थीं
घर का पता पर खो गया था .
जब मैं चौराहे पें पहुँची,
घर का पता मुझको नहीं
था............
जड़-जड़ बदन जब छीजता
था
मस्तिस्क उर्वरक हो
रही थी .
क्षिति अप तेज मरू
व्योम निर्मित
तन, का मोह अब खो
चुकी थी .
इस धरा के
रिश्ते –नातें
थामता मेरे
कदम को .
पर चैत्यपुरुष की
मित्रता का
आस ले चला है मुझको .
सीमा-रहित आकाश के
पर
बादलों में घर छुपा
है
तन का अब सन्ताप
छोड़े
मन सफर पर बढ़ चला है .
काल क्षितिज के उस
पर कोई
मेरी प्रत्याशा
में होगा .
पूरा सफर कर जब मै
पहुँचूं
चिर शांत ,चेतना में
लीन होगा .
समाप्त

4 comments:
मेरा घर -एक चौराहा
मैं एक घर चाहता था
जहाँ जी सकूँ
सुकून की बाँहों में
गलबहियां डाले
और निर्बंध सांसों की गर्माहट से
जगा सकूँ उन अरमानों को
जो दस्तक देती थी -
जोर -जोर से और
झंझोरती थी मेरी मासूमियत को.
आज मेरे पास एक विशाल घर है
जहाँ हमेशा जंग होती है
मेरी मासूमियत और दम्भी बुद्धिजीविता के बीच
पर कोई हारने को तैयार नहीं
तब मैं हार जाता हूँ
और कोसता हूँ उन पलों को -
जिस पल हमने सपने संजोये थे
एक घर बनाने को .
-डॉ.सुनील /०१-१०-२०११ /शाम ७ बजे
बहुत खूब कहाँ तुमने ...तुम्हारी पक्तिया है क्या?
बस अपनी मासुमिअत और सच्चाई को बचाए रखना है..घर तो किसी का इस जमीन पर है ही नहीं...कही दूर क्षितिज के उसपार है...
मैंने ये कविता आपने ससुरजी के मरणोपरांत लिखी थी ,जब मुझे अहसाह हुआ की जिस घर को उन्होंने प्यार से अपने लिए बनाया ओ तो यही है... पर ओ कहीं इन सभी चीजों को छोड़ ,जो कभी उनका अपना था...कही दूर अपने घर चले गए...जहाँ शायद हर किसी को जाना है ..
हरिबंश की कविता ...इस पार प्रिय मधु है तूम हो
उस पार न जाने क्या होगा
बहुत खूब कहाँ तुमने ...तुम्हारी पक्तिया है क्या?
नहीं ?
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