Thursday, September 29, 2011

6.तुम बिन





तुम बिन


हर ओर मुझे क्यों सूनापन

चहु दिश सन्नाटा लगता है ,

तुम पास नहीं तो ए प्रियवर

जाना,अनजाना  लगता है I


मूक भई मैं स्वर भी जड़ -जड़ 

नैनों ने भी प्रतिशोध किया ,

वाणी    सुन  मैं   वायु  की

भंगुरतन ही घायल लगता है I


कोयल की नेह भरी वाणी क्यों 

कानों में शोर मचाती   है ,

मै मौन भई ,मेरा अंतर्मन

जाने क्यों बेगाना लगता है I


आने  की हल्की आहट भी

स्पंदन बढा देती दिल का,

आकर्षण  भरे निमंत्रण  पर

हर प्रात सुनहरा लगता है I



तुम तेजशर बनआओ तिमिरमन में 

मैं  प्रात  उषा  बन  नाचूँगी,

तुम हाथ  धरो , मै  वर  पाऊ

अभिनीत जग जीवन लगता है I


तुम अदभुत स्वप्न बने आओ

मै   राह   निहारें   बैठीं   हूँ ,

हम साथ गगन में उड़ जाये 

सौहार्द्   आमंत्रण   लगता   है I


चिर -सहचर प्राण प्रिये मेरे

तुम साध भये मै मन वीणा ,

तारों के झंग्कृत  कंपन से

काया-मन पुलकित लगता है I




समाप्त 

5 comments:

Sharda said...

Wow..Girl!

Such a great writing. Keep it up! I will love to read more of your creation.

Love: Sharda

seema said...

thanks...any suggestions...

seema said...

असीम,अमाप,अथाह प्रेम का मात्र एहसास ही आपके जीवन को लयव्ध्ध बना देता है ,प्यार की संगीतमय ध्वनि शरीर के एक एक अणु कों प्रेम के शब्दों की प्रतिध्वनि से गुंजायमान कर देता है ...शायद इसीलिए प्रियतम की दूरी वियोग की ज्वाला कस्टदायक होती है...

mithilanchalgroup said...

all of your post are awesome...due to my exams m not able to read all your posts but will definitely read after my exams but 3-4 posts that i read was nice and way of your comment below itself shows your creativity.i suggest you to make a book on all of ur creations...don't worry about the publicity

seema said...

oh thanks again.Yes i am also thinking to publish all my creation in a book,chahe use koi khari ya nahi:-)but i must think about publicity:-)))