Wednesday, September 28, 2011

1.हिंदी हमारी भाषा





हिंदी हमारी भाषा 



 भारत  के इस पाक भूमि पर 

कुछ शब्द लिखे हैं अपरिचित 

अपशिष्ट  विचार 

तनाव ग्रस्त  संस्कृति

हिंदी गुम है चिरपरिचित 

अकुलाता  मानव

 छटपटाती  भीड़

उच्चारण हैं अस्फ़ुटित 

राष्ट्र के बोझिल कंधो पर 

हिंदी दुबकी सहमी 

आह !

हाहाकार ,चीत्कार 

पर करती आत्मसात

कैसी वेदना !

कैसी आह ! 

कर गया अनदेखा हर कोई 

आधुनिकता के छलावे में 

हिंदी बैठीं  हैं 

अपरिचित 


............................
  




2 comments:

ARUN JHA said...

kuchh parimaarjan jaroori hai.

seema said...

thanks for ur suggestion and for using word परिमार्जन means polish
for this poem i must say-
ये कविता मैंने हिंदी दिवस के अवसर पर लिखी थी ,कम से कम शब्दों में अपनी अभिव्यक्ति करनी थी और मै इतने कम शब्दों में इससे बेहतर शायद नहीं कर सकती थी ,जहाँ सिर्फ एक शब्द आपकी बहुत सारी भावनाओं कों दर्शा सकें.
वैसे हिंदी अब हिंदी राष्ट्र में सिर्फ हिंदी दिवस के समय ही याद की जाती है