Wednesday, October 5, 2011

12.“बूढी माँ “




बूढी माँ 




कहीं राह में कुछ पल ,कुछ क्षण थे जो
बीते थे ,एक बुढ़िया................. के संग
वो बेटी  ,पत्नी ,कभी माँ थी..............,

पर आज पड़ी निर्जन वाणी पंगु , 


 समय का न चुकने वाला थकाता विस्तार
 उसकी मुरझाती सिहकती,शश्लथ  उँगलियाँ
जीवन के द्वन्द –अन्तर्द्वन्द के अर्थ ढूढती
    निष्कंप पलकें ,निष्पाप दृष्टी थी माँ की........



वह बेटी थी ह्संती थी,भविष्य के असीम अवाध
जीवन अमृत रस कों ढूढने ,अनंत यतन  करती
द्वंद-अंतर्द्वंद के बीच गतिमानता बनाने कों 

जीवन धूरी पर चलने हेतु उठकर 
यथार्थ के दुसाध्य पथ पर मृदु भाव से चलती थी 


 वह पत्नी थी,आत्मविश्वास और निष्ठां से पूरित 
 कभी सम्मान प्रेम की ऊष्मा से पलकों के ऊपर 
 तो कभी अवहेलना, तिरस्कार  से भोगी जाती 
 मृदुल ,कामिनी ,वह सीता सी  उज्जवल  रमणी
 अर्धांगिनी सहचरी ,प्रकृति की सुन्दर रचना थी


वह माँ थी.थामें हाथों में जीवन की उंगली,अग्रगमिता थी
 जीवन जिज्ञासा,जैविक अनुभव कों जीने 
निष्ठुर माँ, नन्ही पोरों से पृथक होती थी
  आहत नवकोपल  पलभर आतंकित होता 
  फिर बढ़ जाता, पीछे रह जाती उसकी माँ


अब वह आज अकेली है,जीवन अनुभव की सधी काठी 
निज अन्वेषण  विगत जीवन का,
आज के पल में कल को जीती 
रिक्त पङी सुनी आँखें,स्वतः निरखती निष्ठुर अपनो कों 
समक्ष खङा है उसके आगे, पूर्ण विराम उसके युग का 
       उसके जीवन का जीवन का पूर्ण स्थगन ..............


   
समाप्त 

2 comments:

seema said...

नारी तुम केवल श्रद्धा हो,विश्वास रजत जग पग तल में.....
पियूष स्रोत सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में.......
नारी चाहे बेटी ,बहन,पत्नी या माँ हो सर्वथा पूजनीय होती है .नारी की अवहेलना ईश्वर की अवहेलना है . नारी हमेशा निर्विवाद .अपने पूर्वनिर्धारित पात्रो का अभिनय अपनी स्वेक्षा और सलीके से करते हुए अपना संपूर्ण जीवन उत्सर्ग कर देती है ...उस नारी की ,उम्र के उस पड़ाव पर जहाँ उसके खुद का शरीर उसका साथ देने में आनाकानी कर रहा हो ,उसकी अवहेलना करना अत्यंत निंदनीय दृस्तिगोचार होती है ....जिस मजबूत कन्धों पर चढ कर हम झूला झूलाकरते थे ,अगर आज उनको हमारे कन्धों की ,हमारे बाँहों के सहारे की जरूरत है तो हम क्यों ना अपना हाथ बढ़ाएं ..उनकी कमजोरी कों अपने मजबूत कन्धों के सहारे से सुदृढ़ बनायें .......

dr sunil kumar said...

माँ , तेरी गोद मुझे, मेरे अनमोल, होने का,
एहसास कराती है ॥

माँ, तेरी हिम्मत,
मुझको,
जग जीतने का, विश्वास दिलाती है ॥

माँ, तेरी सीख ,मुझे ,
आदमी से,
इंसान बनाती है ॥

माँ, तेरी डाँट ,मुझे, नित नयी,
राह दिखाती है ॥

माँ, तेरी सूरत,
मुझे मेरी,
पहचान बताती है ॥

माँ, तेरी पूजा, मेरा, हर,
पाप मिटाती है॥

माँ तेरी लोरी, अब भी, मीठी ,
नींद सुलाती है ॥

माँ , तेरी याद,
मुझे ,
बहुत रुलाती है ॥

माँ , माँ है और कोई उस जैसा नहीं होता ......