हो अगर वक़्त तो ,
छुट्टियों के चंद लम्हे,
सुनहरी धूप जाड़ों की ,
पतली तंग गलि
याँ
दरियागंज की,
किताबों की खुशबू,
के बीच से गुजरती अपनी चाहत
कभी ना लौटने की ख़्वाहिश
उन काली स्याह अक्षरों में,
जिंदगी दबी है ,
बस ढूढ़ने का हो जज्बा ।
हो अगर वक़्त तो ,
छुट्टियों के चंद लम्हे,
सुनहरी धूप जाड़ों की ,
पतली तंग गलि
याँ
दरियागंज की,
किताबों की खुशबू,
के बीच से गुजरती अपनी चाहत
कभी ना लौटने की ख़्वाहिश
उन काली स्याह अक्षरों में,
जिंदगी दबी है ,
बस ढूढ़ने का हो जज्बा ।
राख़ की ढेर हुँ,
मत तेज हवा तुम करना,
ओ जो दफ़्न है अब तक मुझमें
ना सुलग जाए फिर से ।
कुछ बूंदे तुम अपनी खामोशी की,
गर टपका सको तो ,
मुझ पर मेहरबानी होगी ।
वरना क्या आप,
आप की अजमाइशें,
मेरे इख्लास को,
बिन छुए गुमनाम गुजर जाएगी।
ना इतने जख्म दे जिंदगी
की तेरे दर्द में भी मजा आने लगे,
फिर तेरी पोटली में बंधी खुशियां भी
तूझको मुँह चिढ़ाने लगे ।
चूक जायेगी तेरी अजमाइशें,
जब तेरी जिल्लत में भी मजा आएगा ।
अपनी करनी पर खुद पशेमान होकर,
मेरी फुरकत का फ़तवा तू मुझे सुनाएगा ।
ये सज़ा थी या जश्ने इनाम मेरे लिए ,
ये सोच सोच के फुर्सत में तू पछतायेगा ।।
जिंदगी तेरी रफ्तार में कहाँ अब मेरे कदम चलते हैं,
अब ठहर लूं तो सुकून मिल जाये
थोड़ा थम के अपनी साँसों से
गुफ़्तगू कर लूं,
ना जाने कब कहाँ ये जालिम मुझसे किनारा कर ले
फिर ना रह जाए मलाल
तुझको टोका ही नही,
दो घड़ी रुक के तेरे आगोश सोयी भी कहाँ ।
क्या करूँ जालिम तुमने ही भगाया हर पल,
तुझको थामु कैसे
तू हर पल मुझसे आगे निकल जाती है।।
" भारत "
मैं भूखंड,
मेरी माटी में समाहित
सुदृढ़ संस्कृति की जोश वाणी
सुन सको तो तुम भी सुनलो
आज गाथा चिरपरिचित पुरानी
स्वेत ध्वज शीर्ष मेरा
शान से शिरस्थ गगन को छूता
मुक्त व्योम का छवि फिर
मेरे अंचल को भिगोता
जब हुआ बेकल कभी मन
शीर्ष धारित गंगा को उतारा
भूखंड के सूखे जलज को
अमृत कण से धो ही डाला
शीर्ष उन्नत
मधुर स्त्रोत वाणी समाहित
राग द्वेष भाव से पृथक होकर
मैनें थामी सदृश नश्वर काया
यत्र तत्र बिखरा पड़ा था
मैनें अपने में समेटा
हो विजयी या हो पराजय
मध्य कुरुक्षेत्र मैं ही खड़ा था
मैंने दृढ़ प्रतिज्ञ हो कर
सत्य की ही बाँह थामी
थी समय की राह लंबी
काल चक्र चलता रहा था
मेरी कोख से जन्म ले कर
युग पुरुष बनता रहा था।
मन डरता था लहरों से
क्षीण पड़ा क्यो काल निरंतर,
आज दर्पण से पूछ ही डाला
"क्या यही जिंदगी' ?
दिया पलट के उसने प्रतिउत्तर ,
बड़े जतन से रंग भरा था
मणि से सज्जित चादर दी थी
फिर क्यों मूरख पूछ रहा है,
"क्या यही जिंदगी"?
मैंने बोला रोष दिखा कर,
मुझसे ज्यादा तुमने भर दी
उनकी झोली में खुशियाँ,
मेरे दामन में क्यो डाला
इतने सारे कंकड़ भी ।
भाँप गयी मन की दुर्बलता
मृगनयनी ने हँस कर टोका
अगर चाहिए उनकी खुशियाँ
उनके ग़म भी लेने होंगे ,
थोड़ी चाहत के इस चक्कर में
चार गुना दुःख ढोने होंगे ।
तस्वीरों को देख कभी भी
उनकी खुशियाँ तुम मत आंको,
अगर पढ़ सके उनकी भाषा
तब ही उनके मन में झांको ।
जग चिंताओं से मुक्त कहाँ तुम
व्यर्थ चिन्ताओं में घिर जाते हो,
साध लो अपने मन की वीणा
फिर जीने में रस आएगा।
कहाँ पड़े हो इन पचरों में
अपने मन के अंदर देखो ,
अगर ढूंढ ली अपनी खुशियाँ ,
फिर सबकी खुशियों में तुमको
अपना भी कुछ मिल जाएगा ।।
मुझे उन चमकती आँखों के सपने पढ़ना अच्छा लगता है ।
सपनों के महल कितने अपने होते हैं ।
घर की दीवार जहाँ सोने की ,छत चाँदी की होती है ।
हर तरफ दीवारों में खिड़कियाँ
और खिड़कियों से छन करआती रुपहली धुप की नरमी
रुपहली धुप मेरी मुठ्ठी में समाती तो नहीं
बस मेरी आँखों से उतर मुझको अपना सा बना देती है ।
ओ मुझपर ,मेरे होने का गुमान आया था अभी,
मुझे पिघला के फिर तुम जैसा बना देती है ।
आओ ,मिलकर हम तुम एक सपना देखे ।
एक सपना ही तो है ,देखने में भला अपना जाता क्या है ।
शायद किसी रोज साथ चलते चलते
ओ तुमसे मुखातिफ़ होकर
तुमसे तुम्हारे घर का पता गर पूछ लिया ,
मैं वही पास खड़ी तेरे सपनों का हक़ीक़त देखूंगी ।।