Monday, September 24, 2018

41.दरियागंज

हो अगर वक़्त तो ,

छुट्टियों के चंद लम्हे,

सुनहरी धूप जाड़ों की ,

पतली तंग गलि

याँ

दरियागंज की,

किताबों की खुशबू,

के बीच से गुजरती अपनी चाहत

कभी ना लौटने की ख़्वाहिश

उन काली स्याह अक्षरों में,

जिंदगी दबी है ,

बस ढूढ़ने का हो जज्बा ।

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