हो अगर वक़्त तो ,
छुट्टियों के चंद लम्हे,
सुनहरी धूप जाड़ों की ,
पतली तंग गलि
याँ
दरियागंज की,
किताबों की खुशबू,
के बीच से गुजरती अपनी चाहत
कभी ना लौटने की ख़्वाहिश
उन काली स्याह अक्षरों में,
जिंदगी दबी है ,
बस ढूढ़ने का हो जज्बा ।
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