Monday, September 24, 2018

40.राख़

राख़ की ढेर हुँ,

मत तेज हवा तुम करना,

ओ जो दफ़्न है अब तक मुझमें

ना सुलग जाए फिर से ।

कुछ बूंदे तुम अपनी खामोशी की,

गर टपका सको तो ,

मुझ पर मेहरबानी होगी ।

वरना क्या आप,

आप की अजमाइशें,

मेरे इख्लास को,

बिन छुए गुमनाम गुजर जाएगी।

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