राख़ की ढेर हुँ,
मत तेज हवा तुम करना,
ओ जो दफ़्न है अब तक मुझमें
ना सुलग जाए फिर से ।
कुछ बूंदे तुम अपनी खामोशी की,
गर टपका सको तो ,
मुझ पर मेहरबानी होगी ।
वरना क्या आप,
आप की अजमाइशें,
मेरे इख्लास को,
बिन छुए गुमनाम गुजर जाएगी।
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