दरिया रोज मिलती
उस झुके पीपल के शाख से
चूमती उसे ,धीरे धीरे थपकियाँ देती
शाख दर्प से लहलहाती ,झूमती
मीठे स्वर में गीत गुनगुनाती
दोनों यूही मिलते,
घंटो हाथों में हाथ डाले
अपना सुख दुख बाँटते
एक दिन दरियाँ के कोने बंजर हो गए
जो कुछ बचा ओ संभाले
ओ कहीं और चल निकली
शाख ने इंतजार के रस्ते देखें
ना जाने कितने दिन गिने
कितनी रातें आंखों में गुजारी
सुख कर स्याह पर गयी
सूखे पत्तों को गुजरते देखा
मिलने की चाह लिए ,
उनके साथ वह निकली ।।
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