हमारी सीता
ना जय की ,ना विजय की
ना भोग विलाश ,ना प्रलोभन की सीता
ना प्रेम वासना की सीता,
ना प्रेम वासना की सीता,
ना पुरुस्तव की सीता
सीता खुद की सीता
हर एक नारी की सीता
नारी सशक्तिकरण के
आगाज़ की सीता
हमारी सीता।।
जनक की गोद में बैठ
शाश्त्रार्थ करती
तर्क वितर्क में गुुणी जनों को
परास्त करती सीता,
हमारी सीता ।
किसकी सीता,
राम की?
जिसके साथ सामाजिक डोर से बंधी
जंगल जंगल विचरती सीता
स्वर्ण हिरण की इक्षा दिखला कर,
प्रेम ,पुरुस्तव को आँकती सीता
एक कुश को शस्त्र बना कर
नक्षत्र पतन के क्षण में
स्वयं की रक्षा करती सीता
अग्निकुंड से सहज निकल कर,
खुद का दंभ दिखलाती सीता
लोक लाज से डरनेवाले
पुरुषोत्तम को
स्वतः त्याग कर
अपने खुद के होने का
विश्वास दिलाती सीता
सकल व्यवस्था देख जगत की
आह चित्कार कराहती सीता
चिर दग्ध दुःखी
तीक्ष्ण नुकीले लव कुश से
वाण चलाती सीता
हुआ प्रतिकार असहय अब
धरा में स्वयं समाती सीता
मानसिक पतन के जीवन लय में
हर नारी की आवाज उठती सीता
हमारी सीता ।
हमारी अपनी सीता

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